
निशब्द एक नाटक है जो कोरोना काल की ट्रेजेडी पर केंद्रित है और इस सच्चाई को उजागर करने का प्रयास करता है कि कोई भी महामारी अकेले नहीं आती. यह अपने साथ बहुत सी आपदाएं लाती है. ये नाटक दिल्ली-एनसीआर के एक कप्पल अजय साहनी और गार्गी के इर्द-गिर्द घूमता है. उनकी एक बेटी है जो अपने पति के साथ बेंगलुरु में रहती है और एक बेटा, नकुल, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए काम करता है. गार्गी ने कोविड टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद खुद को एक कमरे में क्वारंटीन कर लिया. अजय पर अब पूरे घर की पूरी जिम्मेदारी है. समय के साथ गार्गी की तबीयत बिगड़ने लगती है. ऑक्सीजन का स्तर कम होने के कारण, परिवार ऑक्सीजन सिलेंडर लाने के लिए हर संभव तरीके का प्रयास करता है, लेकिन सारी कोशिश बेकार हो जाती है. यहां तक कि अस्पताल भी खचाखच भरे हुए थे, बिस्तर उपलब्ध नहीं थे. पर्याप्त इलाज न होने के कारण गार्गी की मौत हो गई. यहां तक कि दाह संस्कार भी परिवार के लिए परेशानी का सबब बन गया क्योंकि श्मशान घाट पर रजिस्ट्रेशन के लिए लंबी लाइन लगी हुई थी. उन्हें तीन दिन बाद अपना नंबर मिलता है. इस दौरान पार्षद भी शव को ले जाने की तैयारी नहीं कर पाए. शव से निकलने वाली दुर्गंध सोसाइटी के अपार्टमेंट में फैल रही थी.
समारोह में सुरेंद्र शर्मा द्वारा निर्देशित धनपति नवाब से प्रेम के लिए श्री राम शर्मा ‘कापरेन’ जैसे अन्य नाटक भी सुनाए गए. दूसरा पुरस्कार विजेता नाटक नवाब नाम के एक बच्चे के बारे में है जिसे अपनी सौतेली मां के दुर्व्यवहार का खामियाजा भुगतना पड़ा. नवाब ने बाल विवाह और जल्दी तलाक के बाद घर छोड़ दिया और एक विधवा से दोबारा शादी कर ली. इस चरण में, वह ज़माना पत्रिका के संपादक दयानारायण निगम से मिलते हैं, जो जीवन भर एक संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं. ऐसे में नवाब उर्दू कहानियां लिखते रहे और उन्हें ज़माना में प्रकाशित करवाते रहे. नवाब राय की पुस्तक सोजे वतन पर जब ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया तो निगम जी की सिफारिश पर यह नाम हटा दिया गया. इस तरह उनका नया नाम प्रेमचंद पड़ा. अपनी कठिनाइयों के बावजूद, प्रेमचंद ने हिंदी में कहानियां, उपन्यास और नाटक लिखना जारी रखा. महात्मा गांधी के अनुरोध पर, उन्होंने सरकारी पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी गरीबी के बावजूद अपने लेखन के साथ राष्ट्रीय कर्तव्य निभाया. जीवन के मोह-माया से दूर प्रेमचंद एक बड़े लेखक बनें.
महाशर्मन चंद्रगुप्त मौर्य के लिए डॉ प्रतिभा जैन ने तीसरा स्थान हासिल किया. भारती शर्मा ने नाटक का निर्देशन किया जिसकी रचना रिसर्च पर आधारित है. लेखक ने बताया कि सम्राट चंद्रगुप्त आचार्य चाणक्य से मर्यादा में दूर चले गए और मुनि भद्रबाहु की उपस्थिति में जैन श्रमण साधु बनकर दिगंबर जैन धर्म अपना लिया और वे मगध को छोड़कर दक्षिण में श्रवणबेलगोला के चंद्र गिरि के पास चले गए. चंद्रगुप्त ने पहाड़ पर जाकर अपने गुरु भद्रबाहु के सामने गुफा में तपस्या की और जीवन और मृत्यु चक्र से मुक्ति पाने के लिए समाधिमरण को चुना.
इश्क समंदर के लिए श्री दयानंद शर्मा को चौथा स्थान मिला. नाटक का निर्देशन अयाज खान ने किया. इश्क समंदर बिहार के एक पिछड़े गांव के दलित इंजीनियरिंग के एक इंजीनियरिंग छात्र पर आधारित नाटक है, जो कई कारणों से अपनी बी.टेक की परीक्षा पूरी नहीं कर सका. वह अपनी पढ़ाई और अपनों को छोड़कर एक नेक काम के लिए अपने गांव चला जाता है और वहां थिएटर पढ़ाने के लिए एक स्कूल में दाखिला लेता है. यह एक महत्वाकांक्षी युवा की मनोरंजक कहानी है.
10 जनवरी, 2023 को शुरू हुए इस चार दिन के कार्यक्रम में अखिल भारतीय मोहन राकेश नाट्य लेकन प्रतियोगिता से चार नाटककारों का चयन किया गया. विजेताओं को दी जाने वाली पुरस्कार राशि में प्रथम पुरस्कार 50,000 रुपये, द्वितीय पुरस्कार 40,000 रुपये, तृतीय पुरस्कार 30,000 रुपये और कॉन्सोलेशन पुरस्कार 20,000 रुपये तय था. इसके अलावा इन नाटकों को साहित्य कला परिषद द्वारा ‘नाट्य तरंग’ पुस्तक में पटकथा के रूप में प्रकाशित किया जाएगा. पुस्तक का वर्जन 2019 में प्रकाशित हुआ था और सम्मान समरोह में पहली बार प्रकाशित हुआ था.










