
मैं रितू (बदला हुआ नाम) पेशे से एक डॉक्टर हूं। एक सरकारी अस्पताल में कार्यरत हूं, 40 से 50 हजार रुपये कमाती हूं। जब मैं 28 साल की हुई तो मां-पापा ने शादी की प्लानिंग की। महज 6 महीने में कई लड़के मुझे देखने आए, लेकिन एक वजह से लगभग सभी रिश्तों ने मुंह मोड़ दिया और वो वजह थी मेरा सांवला (समाज की नजरों में काला) रंग। हर पढ़ा लिखा लड़का यही कहता कि बाकी तो सब ठीक था, बस लड़की थोड़ी गोरी होती तो अच्छा होता। सांवले रंग ने मेरी डॉक्टरी की डिग्री, खुद का घर, गाड़ी जैसी तमाम उपब्धियों पर ऐसे पानी फेरा जैसे मछली को पानी से निकाल दिया गया हो।
ऐसी कई कहानियां हैं आज के आधुनिक भारत में। जहां लड़कियां आसमान को छूने, मर्दों से आगे निकलने, चांद पर जाने, परिवार को सिर्फ मानसिक नहीं बल्कि आर्थिक तौर पर मजबूत बना रही हैं वहां उसका सांवला रंग दूध में नींबू के रस का काम कर रहा है। शादियों के लिए बनीं साइट्स, अखबार में निकलने वाले विज्ञापन में 99% में लिखा होता है “Wanted a fair and beautiful girl for boy”। साइट ही क्यों आम जीवन में भी कहते सुना ही होगा ‘हमारा लड़का गोरा है। लड़की गोरी और सुंदर होनी चाहिए’। इन शब्दों को बड़े ही इत्मिनान से लिया जाता रहा है। गोरी और सुंदर पर ऐसे जोर दिया जाता है जैसे मानो काला या सांवला रंग होना लड़की में कोई कोई ऐब हो।
इस देश में शादी के लिए सुंदरता की एक ऐसी परिभाषा गढ़ी गई है जिसका जवाब शायद वो चित्रकार भी न दे पाएं जिन्होंने मोनालिसा की तस्वीर बनाई थी। आखिरकार शादी के विज्ञापन और शादी के लिए पहली च्वाइस बनाने के लिए लड़कियों का गोरा होना जरूरी क्यों हैं? दरअसल, इसके पीछे चैनलों पर आने वाले विज्ञापन में टीवी स्टार्स का वो जलवा कारण है। जब भी टीवी पर किसी क्रीम, फेसवॉश का विज्ञापन आता है तो पहली लाइन होती है … क्या आपका रंग सांवला है? तो लगाइए ये क्रीम महज 7 दिनों में ये आपको गोरा बनाएगी। विज्ञापन का स्तर तो देखिए कहा जाता है कि हमारी क्रीम को लगाने से आपकी ज़िंदगी बदल जाएगी, मनचाही नौकरी, मनचाहा वर मिलेगा, दोस्तों मे आपकी इज़्जत बढेगी, अन्याय के खिलाफ़ खड़े होने की ताकत देगा, आपकी अलग पहचान बनाएगा। ऐसे विज्ञापन मनुष्य की त्वचा के रंग को उसके अंदर छिपे हुनर और कला को नीचा दिखाते हैं, मानो उसकी कामयाबी में इनकी कोई भूमिका ना हो। सिर्फ रंग के कारण एक लड़की को सफलता मिलती हो।
सवाल है कि शरीर के रंग को हमारी सफलता से क्यों जोड़ा जाता हैं? फिर भी हालात ये हैं कि 10 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक की गोरा बनाने वाली क्रीम बाज़ार में उपलब्ध है, अमीर से लेकर ग़रीब, हर कोई इनका इस्तेमाल करता है। खासकर घर में बैठी मां, बुआ, चाची और मोहल्ले की आंटियां एक लड़की ये सब इस्तेमाल नहीं भी करना चाहेगी ना तो भी करवाएगी ये बोलकर कि शादी के लिए अच्छा लड़का मिल जाएगा। शादी के लिए गोरेपन की ये मांग आज लड़कियों में हताशा का कारण बन रही है।
एक सर्वे में यह बात सामने निकलकर आई थी कि भारत में लगभग 41% महिलाएं सांवले रंग के कारण डिप्रेशन में हैं। बचपन से लेकर किशोरावस्था तक उन्हें कई तरह के उबटन, क्रीम, फेशियल सिर्फ इसलिए करवाए जा रहे हैं ताकि शादी में किसी तरह का समझौता न करना पड़े। क्योंकि बचपन से उनके दिमाग में एक ही चीज बैठ जाती है अगर रंग सांवला है तो समझौता करना पड़ेगा, दहेज ज़्यादा देना पड़ेगा, अपने से ज्यादा उम्र के लड़के से भी शादी करनी पड़ेगी। इन सबके लिए सिर्फ दकियानुसी सोच जिम्मेदार है। चाहे वो टीवी के विज्ञापन हों या फिर विवाह के लिए साथी खोजने वाली वेबसाइट यहां से गोरा-गोरा-गोरा हटाना जरूरी है। हमें यह समझना होगा कि त्वचा के रंग से किसी की योग्यता, कौशल और सामर्थ्य को नहीं मापा जा सकता है। अगर गोरा होना खूबसूरती का पर्यायवाची नहीं है तो फिर काला या सांवला होना कैसे बदसूरती का पर्यायवाची हो गया।
वर्तमान में जो हालातों को देखकर सिर्फ ये कहा जा सकता है कि विज्ञापन, शादी वाली साइट्स बदले न बदले लड़कियों को खुद ही इस खेल में अपनी जीत हासिल करनी होगी। खुद से प्यार करते हुए अपने रंग को अपनाते हुए सपनों को पूरा करना होगा।










