
उदारीकरण के दौर में कोशिश होनी चाहिए की बेटियों की जेब पैसों से भरी हो। बेटियां आत्मनिर्भर होती जाएंगी तो दहेज जैसी समस्या का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। अब तो सक्षम बेटियां माता-पिता का संबल भी बन रही हैं।
शिक्षा में बेटियों का दबदबा
कभी महिलाएं चादर ओढ़े बिना घर से नहीं निकलती थीं लेकिन अब बेरोकटोक घूम रही हैं। आज कोई भी समझदार महिला किसी पार्टी से चुनाव लड़कर वह सांसद हो सकती है। देश की राष्ट्रपति बन कर देश चला सकती है। पर उसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है बेटी को स्कूल भेजना क्योंकि एक बेटी दो परिवारों को शिक्षित करती है। शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। आजकल हर तरह की परीक्षाओं में लड़कियां बजी मार रही हैं।
संस्कारों की नारी
प्रकृति ने बेटियों को संसार संभालने वाला बनाया है। मां के दया भाव, प्रेम और संस्कार के पालन पोषण से ही बालक सही राह पर चलते है। इतना होने के बावजूद हम उनकी अनदेखी और अपमान कर रहे हैं, जिससे वे खुद को छोटा समझने लगी हैं।
कानून कड़े होते जा रहे हैं लेकिन हैवानियत पर रोक नहीं लग रही है। कानून से कुछ नहीं होगा। बच्चों को स्नेह और संस्कार देकर संवेदनशील बनाना होगा तभी सामाजिक सुरक्षा कायम होगी। यह काम सिर्फ मां कर सकती है।
मुश्किलों में अवसर
पहली बार सबके बीच चारपाई पर बैठी, साइकल चलाना शुरू तो पिता को गांव वालों से ताने सुनने पड़े। बेटे को खाना बनाना सिखाने लगी तो सुनने को मिला कि सोने की कुदाल से मिट्टी क्यों खोद रही हो? लड़कियों को बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए मानसिकता बदलनी होगी।
आशा, प्रबंधन के गुण, सतत चलने और संघर्ष की ताकत की बदौलत बेटियां आगे बढ़ रही हैं। महिलाओं को दबाने और सताने का काम चल रहा है और वे इस प्रतिरोध में अवसर तलाशकर निखरती जा रही हैं।
बेटे से ज्यादा बेटी
दंड और सजा के डर से लिंग परीक्षण पर बहुत हद तक लगाम लगी है लेकिन फिर भी गर्भ अवस्था में ही कई बच्चियों की मौत हो रही है। निमोनिया जैसी बीमारी होने पर लोग बेटे का तो इलाज कराते हैं, लेकिन बेटियों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं। बच्चियों का ठीक से टीकाकरण तक नहीं कराया जाता है। कई लोगों को जानता हूं जिनके बेटे कनाडा और दिल्ली में हैं। साल में एक बार आते हैं लेकिन बेटियां रोज हाल पूछती हैं।
एक पंख से कैसे उड़ पाएगा समाज
स्त्री-पुरुष दो पंखों की तरह हैं। कोई एक पंख से उडऩे की कल्पना भी कैसे कर सकता है। बेटों और बेटियों में फर्क की रूढि़ को तोडऩा होगा। यह काम शिक्षा से होगा। वैश्वीकरण के दौर में पैसा सबसे बड़ी ताकत है।
बेटी के जेब में पैसा पहुंचाने के बारे में काम करना होगा। अभिभावकों को बेटी की शादी करके गंगा नहाने की सोच से उबरना होगा। NSS की छात्राओं के लिए रात्रिकालीन शिविर का प्रस्ताव रखा तो पुलिस और सहकर्मियों ने विरोध किया। यह सफल रहा तो अब सब जगह से सहयोग मिल रहा है।
दहेज उत्पीडऩ
ग्रामीण इलाकों में दहेज की समस्या बेहद जटिल हो गई है। इसकी वजह से लोग बेटियों के जन्म से नाखुश होते हैं। अब लोग दहेज की जगह कमाऊ बीवी की तलाश करने लगे हैं। नजरिया बदला है लेकिन सटीक नहीं है।
बेटियों को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाकर ही इस समस्या से निजात पाई जा सकती है। सफल बेटियों की दास्तान को सामने लाकर समाज को इसके लिए जागरूक किया जा सकता है।
समानता, सुरक्षा और शिक्षा
बेटियां किसी मामले में पीछे नहीं हैं। पुरुष एकाग्र होकर काम नहीं करते जबकि महिलाएं अपने काम में पूरी तन्मयता दिखाती हैं। इसीलिए हर काम में उन्हें सफलता मिलती है।
विपरीत हालात में भी महिलाएं राष्ट्रपति तक की कुर्सी पर पहुंची हैं। समानता, सुरक्षा और शिक्षा का बंदोबस्त करके बेटियों की हालत सुधारी जा सकती है। यह काम घर से ही शुरू करना होगा।










