
आजकल सारी दुनिया कोविड के चलते अपने घरों में कैद है या तो सिमित समय के लिए बाहर की दुनिया में जा रहे हैं। ऐसे में बड़ों के साथ साथ बच्चों का खेलना कूदना भी बंद हो गया है। शोधकर्ताओं ने एक रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि जो युवा बहुत अधिक समय तक बैठे रहते हैं, उनमें डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है।
लैंसेट साइकियाट्री जर्नल में छपे अध्ययन के अनुसार पाया गया कि 12 साल की उम्र में रोजाना 60 मिनट की एक्स्ट्रा वर्कआउट चलना, भागना, साईकल चलने जैसे काम करने से 18 साल की उम्र में डिप्रेशन के लक्षणों में 10 प्रतिशत की कमी से देखि जा सकती है।

यह रिसर्च यूके के यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में हुई। रिसर्च के प्रमुख लेखक आरोन कंडोला ने बताया, “हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि युवा लोग जो अपने टीनएज में दिन में ज्यादातर कुछ नहीं करते और बड़े अनुपात में निष्क्रिय रहते हैं, उन्हें 18 साल की उम्र तक डिप्रेसन का अधिक खतरा होता है।”
कंडोला ने आगे बताया, “हमने पाया कि किसी भी तरह की शारीरिक गतिविधि जो हमारे खाली बैठने के समय को कम कर सकती है, वह फायदेमंद साबित होने की संभावना है।”
रिसर्च टीम ने 4,257 किशोरों के डेटा का उपयोग किया। ब्रिस्टल के बच्चों के विश्वविद्यालय में 90 के दशक से कोहोर्ट अध्ययन के लिए जन्म से ही यह बच्चे भाग ले रहे थे। 12, 14 और 16 साल की उम्र के बच्चों की गतिविधि को तीन दिनों के अंतराल में कम से कम 10 घंटे तक ट्रैक करने के लिए एक्सेलेरोमीटर पहनाया हुआ था।

एक्सेलेरोमीटर के आँकणों से यह सामने आया कि क्या बच्चा हल्की गतिविधि में शामिल था, जिसमें चलना या शौक से पेंटिंग करना या वाद्य यंत्र बजाना शामिल था। दूसरे ग्रुप में दौड़ने या साइकिल चलाने वाले मध्यम शारीरिक गतिविधि वाले बच्चे थे। और तीसरा ग्रुप था जिन्होंने कोई भी शारीरिक गतिविधि नहीं की।
रिसर्च टीम ने पाया कि 12, 14 और 16 साल की उम्र में रोज एक्स्ट्रा 60 मिनट की फिसिकल एक्टिविटी की कमी 18 साल की उम्र में डिप्रेसन के स्कोर में 8-10 प्रतिशत तक वृद्धि कर सकता है।
रिसर्च टीम के वरिष्ठ लेखक जोसेफ हेस ने बताया, “हल्की फिसिकल एक्टिविटी विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है क्योंकि इसमें अधिक प्रयास की आवश्यकता नहीं होती है और अधिकांश युवा लोगों को रोज की दिनचर्या में फिट होना आसान होता है।”










