ज़िंदगी में डिसिप्लिन बहुत ज़रूरी है। इस बात से हम सभी इत्तेफाक रखते हैं। डिसिप्लिन के बिना ज़िंदगी में अपने लक्ष्य को पूरा करना एक सपने के ही तरह है। पर डिसिप्लिन का ये मतलब बिलकुल नहीं होता की बच्चों को डरा – धमका कर ही सही बातें सिखाई जाये।
डिसिप्लिन और और डर में बहुत फर्क होता है। इसलिए बच्चों को डिसिप्लिन सीखाने से पहले खुद बड़ो को भी ये समझने की ज़रूरत होती है की डिसिप्लिन और डर में ज़मीं आसमा का अंतर होता है। कई बार हम बड़े बच्चों को डिसिप्लिन सिखने के लिए उनके साथ बहुत सख्ती से पेश आते है। कई बार तो ये सख्ती मार – पीट का भी रूप ले लेती है। जो की बिलकुल सही नहीं है।
बच्चों को अनुशासन यानि डिसिप्लिन सीखना कभी भी आसान नहीं रहा है। पर बच्चों को प्यार और दुलार से हम कुछ भी सीखा सकते हैं।
सबसे पहली बात बच्चों को डिसिप्लिन सीखना चाहते हैं तो खुद भी डिसिप्लिन में रहकर बच्चों के लिए आदर्श बने। आखिर बच्चे हमसे ही तो सीखते हैं।
अगर बच्चे से अनजाने में कोई गलती हो जाए तो उसे हमेशा अकेले में और सहजता से उसकी गलती का अहसास दिलाना चाहिए।
सम्मान पर सबका हक़ होता है। फिर क्या बच्चे और क्या बड़े।