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कमला भसीन नारीवादी आंदोलन को शक्ति के साथ विरासत में कविता, गीत देने वाली महिला

FACEBOOK/KAMLABHASIN

महिलाओं के उत्थान के लिए काम करने वाली जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता और कवियत्री कमला भसीन (Kamla Bhasin) का निधन हो गया है। दक्षिण एशिया की महिलाओं को अपने नारों, गीतों से सशक्त करने वाली कमला भसीन ने लंबे समय तक कैंसर से जंग लड़ते हुए जिंदगी शनिवार को हार गईं। कमला भसीन की करीबी मानें जाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव ने ट्वीट कर उनके निधन की जानकारी दी। उन्होंने लिखा, ”हमारी प्रिय मित्र कमला भसीन का आज 25 सितंबर को लगभग 3 बजे निधन हो गया। यह भारत और दक्षिण एशियाई क्षेत्र में महिला आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका है। विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने जीवन का जश्न मनाया। कमला आप हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेंगी। एक बहन जो गहरे दुख में है।”

इतिहासकार इरफान हबीब ने कमला भसीन को याद करते हुए लिखा, ”प्रिय मित्र और असाधारण इंसान कमला भसीन के दुखद निधन के बारे में सुनकर बहुत दुख हुआ। हम कल ही उनके स्वास्थ्य के बारे में चर्चा कर रहे थे लेकिन यह कभी नहीं सोचा था कि वह अगले दिन हमें छोड़ देंगी। आप बहुत याद आएंगी।” कमला भसीन को याद करते हुए बॉलीवुड एक्ट्रेस शबाना आजमी भावुर हो गईं। उन्होंने कहा, “मुझे हमेशा से लगता था कि कमला भसीन अजेय थीं और वह अंत तक अजेय रहीं। उनकी कथनी और करनी में किसी तरह का विरोधाभास नहीं था।”

कमला भसीन का जाना नारीवादी आंदोलन और स्त्रियों के उत्थान के लिए एक बड़ी क्षति है। ऐसा इसलिए क्योंकि कमला भसीन ने अपने गीतों, सरल भाषा और सहज़ स्वभाव से अपने विचारों को न सिर्फ आम जनता तक पहुंचाया बल्कि नारीवादी आंदोलन को एक नई रूप रेखा देते हुए उंचाइयों पर ले गईं। 21वीं सदी में आज जब हम शहरी और ग्रामीण भारत की महिलाओं को एक धागे में बांधने की बात कर रहे हैं कमला भसीन ने इसे 19वीं सदी में ही कर दिया। कमला भसीन का सरल स्वभाव और उनके मिलने-जुलने का ढंग लोगों को आकर्षित करता था। कमला भसीन को जानने वाले अक्सर कहते हैं कि उनके बात करने के अंदाज में एक पॉजिटिविटी थी, जो भी उनसे मिलता था उसके विचार भी पॉजिटिव हो जाते थे।

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45 साल तक महिला आंदोलन का हिस्सा रहीं

नारी उत्थान के लिए कमला भसीना का सफर 1975 में पार्लियामेंट्री कमेटी की रिपोर्ट स्टेटस ऑफ़ विमन इन इंडिया से शुरू हुआ और फिर मथुरा रेप केस में काम करते हुए उन्होंने महिलाओं के लिए आवाज बुलंद की जो आखिरी सांस तक नहीं ठहरी। वह 45 साल तक महिला आंदोलन का हिस्सा बनी रहीं। कमला ने सिर्फ महिला के लिए काम नहीं किया बल्कि मानवाधिकार क्षेत्र में पीयूसीएल के साथ खड़ी रहीं।

कमला भसीन को सबसे करीब से जानने वालीं कविता श्रीवास्तव का मानना है कि उन्होंने अपने काम और जज्बे से लोगों को न सिर्फ सीमाओं को तोड़कर आगे बढ़ाना सिखाया बल्कि नई बुलंदियों के शिखर पर कैसे पहुंचना है इसके लिए प्रेरित किया।

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काफी करीब से देखी चुनौतियां

कमला भसीन के आंदोलन और महिलाओं के लिए किए गए कार्यों की अक्सर चर्चा होती है, लेकिन उनकी चुनौतियों को कुछ ही लोग जानते हैं। कमला भसीन का बचपन राजस्थान के ऐसे गांव में बीता जहां उन्होंने महिलाओं की चुनौतियां, बंधन और सामाजिक जंजीरों में बंधे पैरों को करीब से देखा भी और समझा भी। 6 भाई-बहनों वाले परिवार में जन्म लेने वालीं कमला ने अपनी ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई राजस्थान यूनिवर्सिटी से की है और फिर समाजवादी विकास विषय की पढ़ाई के लिए जर्मनी जाने का फैसला किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद कमला जब वापस वतन लौटीं तो उन्होंने अपने काम की शुरुआत ग्रह राज्य राजस्थान में सेवा मंदिर संगठन के साथ की।

नारीवादी आंदोलन करते हुए कमला भसीन ने विरासत के तौर पर ऐसे गीत लिखे। एक बार कमला भसीन ने अपना गीत के बोल, “तोड़ – तोड़कर बंधनों को, देखो बहनें आती हैं, देखो लोगों, देखो बहने आती हैं, आएंगी जुल्म मिटाएंगी, वो तो नया जमाना लाएंगी” गाते हुए कहा था कि कोई भी लड़की अगर महिला आंदोलन से जुड़ेगी, किसी मोर्चे पर जाएगी तो वह ये गाने ज़रूर गाएगी।

आज़ादी किसी एक व्यक्ति द्वारा लिखा हुआ गीत नहीं है. बल्कि ये कहा जाता है कि आज़ादी के विचार को किसी देश की आज़ादी से आगे ले जाकर महिलाओं के मुद्दे से जोड़ने, उसमें पितृसत्ता से, आज़ादी, परिवार से आज़ादी जैसी पंक्तियां जोड़कर नारीवादी आंदोलन का नारा बनाने का श्रेय भी कमला भसीन को जाता है। कमला का ये बड़ा योगदान नारी समाज के लिए विरासत है जिसे न सिर्फ संभालकर चलने की जरूरत है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी तैयार करने की जरूरत है।

 

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