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एक्सक्लूसिव इंटरव्यू – सियाचिन गलेशियर को फतेह करने वाली हिमाचल की चोंगजिन एंग्मो

हिमाचल की दिव्यांग बेटी Chongjin Engmo ने सियाचिन ग्लेशियर को आठ सदस्यीय दल के साथ किया फतह।

एक्सक्लूसिव इंटरव्यू - सियाचिन गलेशियर को फतेह करने वाली हिमाचल की चोंगजिन एंग्मो
Pic Credit: Facebook

अगर एक बार कुछ ठान लिया जाए और उस पर मेहनत की जाए तो हर लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। ऐसा ही कुछ दिव्यांगों की एक टीम ने कर दिखाया है। जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में ही चलने या दैनिक कार्य करने में मुश्किल होती है, उन्होंने 15 हजार ऊंचे पहाड़ पर फतह हासिल कर ली है। अब उनके नाम यह विश्व रिकॉर्ड बन गया है। इसी टीम में शामिल थीं हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के किन्नौर की चोंगजिन एंग्मो (Chongjin Engmo)। सियाचिन गलेशियर को फतेह करने वाली हिमाचल की चोंगजिन एंग्मो देशभर के लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गई है। चोंगजिन एंग्मो दिव्यांग (दृष्टिहीन) हैं।

सियाचिन के सफर से लौटने के बाद चोंगजिन एंग्मो ने सिटी वुमन ने खास बातचीत की और अपने सफर की कहानी को शेयर किया।

8 साल की उम्र में खो दी आंखों की रोशनी

चोंगजिन एंग्मो कहती हैं कि वो बचपन से दृष्टिहीन नहीं थी। महज 8 साल की उम्र में आंखों में डाली जाने वाली एक दवा से उन्हें रिएक्शन हुआ और उन्होंने अपनी आंखों को खो दिया। आंखों को खोने के बाद उन्हें बहुत बुरा लगता था क्योंकि उनके सभी साथी स्कूल जाते थे, लेकिन वो घर पर रहती थीं। शाम को जब उनके दोस्त स्कूल से लौटते थे तब भी चोंगजिन एंग्मो की आंखों में आंसू रहते थे क्योंकि वो पढ़ना चाहती थीं। चोंगजिन एंग्मो ने कहा कि मुझे ऐसा लगता था कि मेरी जिंदगी खत्म हो गई है क्योंकि मुझको दिखना बंद हो गया है।

कुछ वक्त तक पढ़ाई रूकने के बाद मैंने लद्दाख का रूख किया और प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद प्लस टू चंडीगढ़ से और दिल्ली मिरांडा हाउस कॉलेज से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की।

बचपन में ही देखा था एवरेस्ट फतेह का सपना
5 भाई-बहनों के परिवार से आने वाली चोंगजिन एंग्मो ने बचपन में ही एवरेस्ट फतेह करने का सपना बुना था। चोंगजिन एंग्मो ने कहा, ‘ग्रेजुएशन की पढ़ाई दिल्ली में करने का फैसला लेना बहुत मुश्किल था। चंडीगढ़ में दोस्तों का सहारा था, लेकिन दिल्ली में कोई नहीं था। कई बार कॉलेज जाते वक्त मैं नालियों में गिरी हूं, लेकिन सभी लाठी का सहारा नहीं लिया। कई बार तो ऐसा हुआ कि मैं दोबारा हॉस्टोल गई और फिर तैयार होकर कॉलेज पहुंची। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने जून 2016 में ABVIMAS मनाली से अपना बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स किया और पहाड़ों की ओर जाने का पहला कदम उठाया।

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सियाचिन का सफर बहुत खास है…
अपने सियाचिन के सफर के बारे में बात करते हुए चोंगजिन एंग्मो कहती हैं कि उन्होंने कभी इसकी कल्पना नहीं की थी। जब सियाचिन के ट्रिप पर निकलीं तो एक उम्मीद थी। पहाड़ियों पर चढ़ते वक्त दिन में बहुत तेज धूप होती थी और शाम होते ही काफी ठंड हो जाती थी ऐसे में उनके लिए ये डबल चैलेंज था। चोंगजिन एंग्मो कहती हैं कि उन्होंने सियाचिन ग्लेशियर के बारे में किताबों में पढ़ा और ऑडियो में सुना था, जब वो सियाचिन ग्लेशियर पर पहुंची तो लगा कि सपना पूरा हो गया हो।

कई खेलों में भी आजमां चुकी हैं हाथ
माउंटेनियरिंग के अलावा चोंजिन एंगमो नेशनल लेवल पर जूडो की प्लेयर रह चुकी हैं। बातचीत के दौरान चोंजिन एंगमो ने कहा कि वो साइकिलिंग करती हैं और अब स्वीमिंग की प्रैक्टिस करना चाहती हैं। चोंजिन एंगमो के पिता एक किसान हैं और मॉम हाउस वाइफ। चोंजिन एंगमो का मानना है कि एक सफल इंसान के पीछे उसके माता-पिता का बहुत बड़ा हाथ होता है। चोंजिन एंगमो ने कहा, ‘मेरे पापा और मां ने मुझको कभी किसी चीज के लिए नहीं रोका। जब मैं कहीं जा रही होती हूं तो बस बताने की जरूरत होती है। मेरे पापा बस यही कहते हैं कि वो मेरे साथ हर वक्त खड़े हैं। जब अखबारों में मेरा नाम आता है तो मेरे पापा के लिए ये गर्व की बात होती है और मेरे लिए यही सबकुछ है।’

कभी ना रूको और ना हार मानो

चोंजिन एंगमो ने कहा, कि वो आंखों से न देख पाने के बाद भी हो इतना कुछ कर पाई हैं और जिनके पास आंखें हैं वो तो बहुत कुछ कर सकते हैं। किसी भी इंसान (खासकर महिलाओं) को अपने जीवन में हार नहीं माननी चाहिए। अगर आप किसी चीज के लिए कोशिश करते हैं और वो पूरी नहीं होती है तो हार मानने की बजाय दोबारा कोशिश करें, क्योंकि पहली कोशिश से आपको अनुभव मिला है जो बहुत बड़ी चीज है।’

15 हजार ऊंचे पहाड़ पर फतह हासिल करने के बाद चोंजिन एंगमो अब स्वीमिंग सीखना चाहती हैं।

पीएम मोदी ने बांधे तारीफों के पुल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान हिमाचल की चोंजिन एंगमो का जिक्र किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सियाचिन ग्लेशियर के बारे में हम सभी जानते हैं। वहां की ठंड भयानक है, जिसमें रहना आम इंसान के बस की बात ही नहीं है। यहां का तापमान मानइस 60 डिग्री तक भी जाता है। कुछ दिन पहले सियाचिन के इस दुर्गम इलाके में आठ दिव्यांग जनों की टीम ने जो कमाल कर दिखाया है, वह हर देशवासी के लिए गर्व की बात है।

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