
Happy Birthday Lata Mangeshkar: 28 सितंबर का इतिहास से रिश्ता बड़ा ही सुरीला है। अपनी मनमोहन आवाज से कई दशकों तक लोगों के दिलों पर राज करने वाली, संगीत के खजाने में हर दिन नए मोती भरने वाली लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) का आज जन्मदिन हैं। आज से 92 साल पहले 28 सितंबर 1929 के दिन लता मंगेशकर का जन्म इंदौर में मशहूर संगीतकार दीनानाथ मंगेशकर के हुआ था। एक संगीतकार के घर जन्म लेने वाली लता को विरासत में संगीत मिला। लता ने अपने सुरों की साधन बहुत की छोटी उम्र में शुरू की और जल्द ही गायन पर महारत हासिल कर ली। लता (lata Mangeshkar) मानती हैं ‘पिता का गायन सुन-सुनकर ही उन्होंने संगीत सिखा, लेकिन कभी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाईं कि पिता से कह सकें कि उनके साथ गाना चाहती हैं।
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लता मंगेशकर ने उस दौर में संगीत विद्या ली थी जब न तो साउंड रिकॉर्डिंग की तकनीक थी और न ही मिक्सिंग के लिए खास तरह के गैजेट्स हुआ करते थे। ये बात शायद जानकार हैरानी होगी कि संगीतकार गुलाम हैदर ने 18 साल की लता को जब सुना था तो फिल्म निर्माता शशधर मुखर्जी से मिलवाया था। शशधर मुखर्जी ने जब लता की आवाज सुनी तो उन्हें रिजेक्ट कर दिया औऱ कहा कि आवाज बहुत पतली है नहीं चलेगी। शशधर मुखर्जी ने ना सुनने के बाद गुलाम हैदर ने ही लता (lata Mangeshkar) को फिल्म ‘मजबूर’ के गीत ‘अंग्रेजी छोरा चला गया’ में गायक मुकेश के साथ गाने का मौका दिया।
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हालांकि लता मंगेशकर को असली पहचान ‘आएगा आने वाला’ से मिली। लता ने जब फिल्म ‘महल’ के लिए ‘आएगा आने वाला’ गाया तो किसी को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उतार-चढ़ाव भरे इस गाने को रिकॉर्ड करने के लिए किसी तरह की तकनीक का सहारा नहीं लिया गया, बल्कि लता मंगेशकर ने उसे ऐसे ही गाया था। उस वक्त इस तरह के गाने गाना बहुत ही मेहनत और आवाज में संतुलन का काम हुआ करता था।
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‘आएगा आने वाला’ गाने की रिकॉर्डिंग अनुभव को साझा करते हुए लता मंगेशकर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि माइक्रोफोन को कमरे के बीचों-बीच रखा गया और वो दूसरे कोने में खड़ी थी। पहला छंद ‘खामोश है जमाना’ गाते हुए वो माइक की तरफ धीरे-धीरे चलते हुए गईं और जब तक माइक के पास पहुंची तब ‘आएगा आने वाला’ गाना शुरू किया। लता मंगेशकर ने कहा था कि ये गाना परफेक्ट रिकॉर्ड हो सके इसके लिए उन्हें कई बार रिकॉर्डिंग करनी पड़ी थी।
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इस गाने को गाने के लिए लता मंगेशकर ने कई दिनों तक घंटों तक प्रैक्टिस की थी। हालांकि इतनी मेहनत करने के बावजूद प्रोड्यूसर सावक वाचा इससे संतुष्ट नहीं थे उन्हें लगा था कि ये गाना दर्शकों को पसंद नहीं आएगा। लेकिन लता की आवाज का जादू चल गया और सुनने वालों को ये बहुत पसंद आया।
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एक दिन में 8 रिकॉर्डिंग
लता मंगेशकर के संघर्ष की कहानी वैसे तो बहुत बड़ी है, जिसे शब्दों में पिरोना मुश्किल है। 1948-49 वह साल था जब लता मंगेशकर एक दिन में आठ-आठ गाने रिकार्ड करती थीं। दो गाने सुबह, दो गाने दोपहर, दो गाने शाम और दो गाने रात में गाती थीं। एक इंटरव्यू में लता मंगेशकर ने कहा था कि कई बार गाने की रिकॉर्डिंग के लिए सुबह घर से निकलती थीं और रात को 3 बजे तक लौटती थीं। इस दौरान न तो उनके खाना ठिकाना होता और ना ही आराम का।
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आवाज को नाम देने के लिए संघर्ष
यूं ही कोई लता नहीं बन जाता है। इसके लिए सालों तक तपना पड़ता है, बिना खाए-पिए सुनना पड़ता है और फिर भी नाम पाने के लिए लड़ना पड़ता है। लता मंगेशकर ने उस दौर में अपनी पहचान बनाई है, जब गायकों को उनकी आवाज के लिए नाम तक नहीं दिया जाता था। आएगा आने वाला गाने के लिए लता मंगेशकर ने कई दिनों तक मेहनत की, लेकिन जब फिल्म महल रिलीज हुई तो इस गाने के लिए मधुबाला को क्रेडिट दिया गया। रेडियो पर जब ये गाना प्रसारित हुआ तो कई चिट्ठियां स्टेशन आईं और लोगों ने पूछा कि आखिरकार ये गाना किसने गाया है। लेकिन लंबे वक्त तक इसका खुलासा नहीं हुआ। फिल्म ‘बरसात’ में लता मंगेशकर को गायक के तौर पर क्रेडिट मिला तो वो उन्हें अपनी मेहनत सार्थक होते हुए नजर आई।
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आखिरकार क्यों नहीं कि शादी?
एक इंटरव्यू में लता मंगेशकर ने बताया था कि जब वो 13 साल की थीं, तभी उनके पिता का स्वर्गवास हो गया था। ऐसे में घर के सभी सदस्यों की जिम्मेदारियां उन पर थी। कई बार शादी का ख्याल आता तो वे उस पर अमल नहीं कर सकती थीं। बहुत कम उम्र में ही वे काम करने लगी थीं। भाई-बहनों और घर की जिम्मेदारियों को देखते-देखते ही वक्त चला गया और वे ताउम्र शादी नहीं कर पाईं।
अवॉर्ड्स की लिस्ट है बहुत लंबी
अपनी जादुई आवाज से लोगों के दिलों में जगह बनाने वाली लता मंगेशकर को
फ़िल्म फेयर पुरस्कार (1958, 1962, 1965, 1969, 1993 और 1994)
राष्ट्रीय पुरस्कार (1972, 1975 और 1990)
महाराष्ट्र सरकार पुरस्कार (1966 और 1967)
सन 1969 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
सन 1989 में उन्हें फ़िल्म जगत का सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के पुरस्कार’ दिया गया।
सन 1993 में फ़िल्म फेयर के ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
सन 1996 में स्क्रीन के ‘लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
सन 1997 में ‘राजीव गांधी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
सन 1999 में पद्मविभूषण, एन.टी.आर. और ज़ी सिने के ‘लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
सन 2000 में आई. आई. ए. एफ.(आइफ़ा) के ‘लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
सन 2001 में स्टारडस्ट के ‘लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार’, नूरजहाँ पुरस्कार, महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सन 2001 में भारत सरकार ने लता मंगेशकर का सम्मान करते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च पुरस्कार “भारत रत्न” से सम्मानित किया।
गाते वक्त हमेशा एक ही चीज रहती है याद
जीवन के 92 सालों का सफर तय करने वाली लता मंगेशकर आज भी कोई गाना गाती हैं तो उन्हें पिता से विरासत में मिली हुई एक ही सीख याद रहती है कि उन्हें अपने पिता या गुरू से अच्छा गाना है। साल 2011 में लता जी ने आखिरी बार ‘सतरंगी पैराशूट’ गाना गाया था, उसके बाद से वो अब तक सिंगिग से दूर हैं।










