
महामारी के दौर में भारत समेत पूरे विश्व में हर दूसरा व्यक्ति अवसादग्रस्त है। एक आम इंसान से ज्यादा प्रेग्नेंसी के बाद महिलाओं में डिप्रेशन के लक्षण सामने आ रहे हैं। प्रेग्नेंसी के बाद महिलाएं कैसे डिप्रेशन से निकलें इसके लिए कई रिसर्च की जा रही हैं। इसी क्रम में फ्लोरिडा अटलांटिक यूनिवर्सिटी (Florida Atlantic University) के क्रिस्टिन ई. लिन कालेज ऑफ नर्सिग (Kristin E. Lynn College of Nursing) की रिसर्चर्स ने ब्रेस्टफीडिंग (Breastfeeding) कराने की स्थिति और प्रसव के बाद होने वाले अवसाद (Postpartum depression) के रिस्क के बीच संबंधों पर अध्ययन किया।
शोधकर्ताओं द्वारा इस अध्ययन में 29,685 महिलाओं के डाटा का विश्लेषण किया गया। रिसर्च में यह बात सामने निकल आई है कि मां बनने वाली महिलाओं में से प्रति वर्ष 11 से 20 प्रतिशत प्रेग्नेंट लेडीज में डिलिवरी के बाद डिप्रेशन के लक्षण मिलते हैं, जो उनके आत्महत्या या बच्चे की हत्या का कारण बनते हैं।
शोधकर्ताओं ने कहा कि रिसर्च के दौरान उन्होंने पाया कि जो महिलाएं ब्रेस्टफीडिंग करा रही थीं, उनमें फीडिंग नहीं कराने वाली महिलाओं की तुलना में डिलिवरी के बाद डिप्रेशन का रिस्क कम था। जो महिलाएं अपने बच्चों को ज्यादा समय तक ब्रेस्टफीडिंग कराती हैं, तो उनमें डिप्रेस्ड होने का रिस्क भी घटता जाता है।
डिलिवरी के बाद डिप्रेशन के लक्षण
– रिसर्च में यह बात सामने आई है कि बच्चे के जन्म लेने के 4 सप्ताह लेकर 12 महीने तक महिलाओं में डिप्रेस्ड होने का रिस्क बना रहता है।
– इस दौरान बेचैनी, उदासी, चुपचाप रहना, काम न करने के बावजूद थकान महसूस होना जैसे लक्षण देखें जा सकते हैं।
– रिसर्च में यह बात सामने आई है कि ऐसी महिलाओं में कार्डियोवस्कुलर रोग, स्ट्रोक और डायबिटीज टाइप-2 का भी खतरा ज्यादा होता है।
फ्लोरिडा अटलांटिक यूनिवर्सिटी के क्रिस्टिन ई. लिन कालेज ऑफ नर्सिग की डीन सॉफिया जार्ज (Safiya George) का कहना है कि बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं को ब्रेस्टफीडिंग कराना डिप्रेशन के रिस्क को कम कर देता है।
ब्रेस्टफीडिंग से बच्चे को पोषण के अलावा अलर्जी और संक्रमण संबंधी बीमारियों से सुरक्षा मिलती है, जो जच्चा और बच्चा दोनों के लिए लाभकारी है।










