July 18, 2026
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“तुम लड़की हो” को उसकी सीमा नहीं, उसकी शक्ति बनाइए।

“क्यूंकि तुम लड़की हो” अक्सर ये एक लाइन एक अनदेखी बेड़ी की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जो बचपन से ही घर की बेटी को यह एहसास कराता है कि वह ‘कम ‘ है और ‘असुरक्षित’ भी। जब बेटी को कहा जाता है तेज़ मत हँसो, रात को अंधेरे में कहीं मत जाओ, तो परिवार उसे अनुशासन नहीं, बल्कि डर और संकोच सिखा रहा होता है। अब वक़्त आ चुका है इस लाइन का इस्तेमाल और अर्थ को बदला जाए इस लाइन को बेटी की सीमा से बदलकर उसके सामर्थ्य और योग्यता के लिए इस्तेमाल करने की ज़रूरत है।

बचपन से शुरू होती है मजबूती की शिक्षा

उसे महसूस कराए कि “तुम लड़की हो, इसलिए तुममें सृजन और संघर्ष दोनों की शक्ति है। उसे अंधेरे से डराने के बजाय, अंधेरे में रास्ता ढूंढने की कला सिखाएं। उसकी हँसी को शालीनता के तराजू में न तौलें, बल्कि उसे खुलकर जीने का हौसला दें। जब बेटी कोई कठिन काम करे, तो गर्व से कहें— क्यूंकि तुम लड़की हो, इसलिए तुम कुछ भी कर सकती हो। जब वाक्य का संदर्भ पाबंदी से हटकर क्षमता पर केंद्रित हो जाता है, तो वही लड़की समाज की रूढ़ियों को तोड़कर ऊँची उड़ान भरती है।

Indian family cooking together
AI generated image : Indian family cooking together

बराबरी की पहली सीख घर से

समानता की शुरुआत घर के किचन से करें। अगर बेटी रोटी बेल रही है और बेटा सोफे पर बैठकर टीवी देख रहा है, तो आप अनजाने में उसे यह सिखा रहे हैं कि बेटी का का काम परिवार की सेवा करना है। बदलते समय का सबसे बड़ा उदाहरण घर से ही शुरू होता है जहाँ रविवार को पिता खाना बनाते हैं और माँ घर का हिसाब-किताब या गाड़ी की सर्विसिंग देखती है। जब बच्चे देखते हैं कि काम ‘जेंडर’ से नहीं ‘जरूरत’ से तय होते हैं, तो वे समानता को पढ़ते नहीं, बल्कि जीते हैं और सीखते हैं।

sister and brother placing plates on dining table
AI generated image : sister and brother placing plates on dining table

काम और अधिकार का कोई जेंडर नहीं होता

घर में काम को बांटना केवल मदद नहीं, बल्कि संस्कार है। जब बेटा और बेटी साथ मिलकर मेज़ लगाते हैं या कचरा फेंकते हैं, तो उनके मन में यह स्पष्ट होता है कि घर की ज़िम्मेदारी किसी एक ‘जेंडर’ की जिम्मेदारी नहीं है। अक्सर बेटों को ‘घर के बाहर ‘ और बेटियों को ‘घर के अंदर ‘ के कामों तक सीमित कर दिया जाता है, जो उनकी सोच को संकुचित बनाता है। जब पिता रसोई संभालते हैं, तो बेटा सीखता है कि आत्मनिर्भरता मर्द की ज़िंदगी का हिस्सा है। वहीं, माँ को तकनीकी या वित्तीय काम करते देख बेटी समझती है कि कोई भी क्षेत्र उसके लिए वर्जित नहीं है। असल में यही होती है समानता की असली ट्रेनिंग।

indian father and Daughter Conversation – A Glimpse into Raising Strong Daughters
AI generated image : indian father and Daughter Conversation – A Glimpse into Raising Strong Daughters

सवाल पूछने की आज़ादी

बचपन से लड़कियों को ‘एडजस्ट’ करना सिखाया जाता है। “चुप रहना सीखो ,” “थोड़ा सह लोगी तो क्या हो जायेगा” “बड़ों की बात मत काटो।” लेकिन याद रखिए, जो लड़की घर में अपनी बात नहीं रख सकती, वह ऑफिस या समाज में अपने हक़ के लिए कभी नहीं लड़ पाएगी। उसे विनम्र होना सिखाइए, लेकिन दब्बू नहीं। उसे सिखाएं कि उसकी सहमति की कीमत सबसे ऊपर है। परवरिश में ‘एडजस्ट’ करने का पाठ अक्सर लड़कियों के आत्मसम्मान की बलि ले लेता है। जब हम उसे बात – बात पर चुप रहना, जवाब न देना सिखाते हैं, तो हम अनजाने में उसे शोषण स्वीकार करने के लिए भी तैयार कर रहे होते हैं।

असली संस्कार उसे अपनी आवाज़ के महत्व को सिखाने और समझाने में है। एक लड़की जो घर के डाइनिंग टेबल पर अपनी असहमति मर्यादा के साथ दर्ज करा सकती है, वही बाहर की दुनिया में अपने अधिकारों के लिए ढाल बनकर खड़ी होगी। बेटियाँ मजबूत तभी बनती हैं जब उन्हें सवाल पूछने की आज़ादी मिलती है। जब उन्हें “ना” कहने का अधिकार सिखाया जाता है, कहा जाता है “जो लड़कियाँ सवाल करती हैं, वही आगे चलकर बदलाव लाती हैं।”

 

HEMLATA GAUTAM

Editor-in-Chief and Founder of CityWomenMagazine.in